कांग्रेस कमजोर तो जिम्मेवार कौन? | SANMARG Dainik, Ranchi:
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Thursday, September 27, 2012
Saturday, September 22, 2012
Thursday, September 20, 2012
तीसरे मोर्चे का पीएम प्रत्याशी बन सकती हैं ममता
डीजल की मूल्यवृद्धि, रसोई गैस की राशनिंग और एफडीआई के मुद्दे पर तीव्र विरोध करते हुए यूपीए सरकार से समर्थन वापसी का निर्णय लेकर तृणमूल नेत्री ममता बनर्जी ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारतीय राजनीति में वह एकमात्र नेत्री जो सरकार के किसी जनविरोधी निर्णय का जमकर प्रतिकार करने का साहस रखती हैं मायावती और मुलायम की तरह अपने स्वार्थ के लिए हवा का रुख देखकर पलटी मारने या लालू की तरह एचएमवी रिकार्ड नहीं हैं। सरकार के हर जनविरोधी फैसले को रद्द कराने में उनकी भूमिका सराहनीय रही है। अब जबकि यह बात सामने आ चुकी है कि तेल कंपनियों को घाटा नहीं बल्कि मुनाफा हो रहा है और मनमोहन सरकार झूठ बोल रही है तो यह हो जाता है कि जनता पर महंगाई का अधिकतम बोझ लादकर अगले चुनाव के लिए फंड जुटाने के उद्देश्य से तेल कंपनियों के साथ कोई गुप्त समझौता हुआ है। इसलिए सरकार किसी कीमत पर पीछे हटने को नहीं हो रही है। उसे सहयोगी दलों के चरित्र का अंदाज़ा है। उसे पता है कि ममता बनर्जी समर्थन वापस लेंगी तो केंद्रीय मंत्रिमंडल में उनके कोटे के छः मंत्रालय खाली होंगे जिसके लिए कई दल मुंह पिजाये बैठे हैं। उनमें मध्यावती चुनाव का सामना करने का साहस नहीं है। अपनी सत्ता लोलुपता को ढकने के लिए सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता से बाहर रखने का पारंपरिक तर्क मौजूद है ही। लेकिन उन्हें यह पता नहीं कि जनता चीजों को बारीकी से देख रही है और उनकी लोलुपता का माकूल जवाब देगी . अभी ममता बनर्जी के प्रति देशवासियों के मन जो प्रेम और आदर की भावना जागृत हुई है कोई आश्चर्य नहीं कि अगले चुनाव में उन्हें तीसरे मोर्चे के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में स्वीकार कर लिया जाये। वैसे भी ममता संघर्ष के गर्भ से निकली साफ़ -सुथरी छवि की नेत्री हैं। वर्तमान भारतीय राजनीति में ऐसे लोग दुर्लभ हैं।
----नवल किशोर सिंह
----नवल किशोर सिंह
Sunday, September 16, 2012
सुधार का स्वाद कौन उठाएगा
डीजल और रसोई गैस की कीमतें बढाकर हमारे प्रधानमंत्री जी कौन सा आर्थिक सुधार करना चाहते हैं सामान्य जन की समझ के बाहर है। यह कोई पहली बार नहीं है। हर दो चार महीने पर महंगाई में इजाफा कर कॉंग्रेस के नुमाइंदे इस कदर खुश हो जाते हैं जैसे बहुत बड़ा तीर मार लिया हो। बाज़ार को आमजन की पहुंच के बाहर कर वे देशवासियों को जीते जी मार ही डालेंगे तो सुधार का स्वाद कौन उठाएगा। उनके विदेशी आका?
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