Monday, June 6, 2011

बर्बादी के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर

रामलीला मैदान में जो कुछ हुआ वह अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. एक संत पर हमला कर यूपीए सरकार ने अपनी बर्बादी के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर कर दिया है. 1974 में इंदिरा गांधी ने एक राजनैतिक संत लोकनायक जयप्रकाश नारायण की सभा में लाठी चार्ज कराकर कांग्रेस की बर्बादी की कहानी शुरू की थी जिसका भुगतान आजतक उत्तर भारत में जनाधार संकुचन के रूप में चुकाना पड रहा है. बाबा रामदेव के अनशन स्थल पर बर्बरता का तांडव कराकर फिर उसी गलती की पुनरावृति की गयी है. इंदिरा गांधी एक ताक़तवर और दबंग महिला थीं स्वभाव की जिद्दी थीं लेकिन राजनैतिक रूप से परिपक्व थीं. जब भारत की जनता ने उनकी तानाशाही को बर्दाश्त नहीं किया तो अभी के कांग्रेसी नेतृत्व की तानाशाही को कैसे बर्दाश्त करेगी. अभी तो इंदिरा की कद-काठी क्या उनकी नाखून के बराबर कद का भी कोई नेता कांग्रेस में नहीं है.फिर एक संत से टकराने को एक आत्मघाती कदम के अलावा और क्या कहेंगे.
---नवल किशोर सिंह 

Sunday, January 30, 2011

यदि गाँधी जीवित होते...

महात्मा गाँधी की पुण्य तिथि मनाने की रश्म सरकारी तौर पर पूरी कर ली गयी. गाँधी अब दरअसल दीवालों में सजाने या वैचारिक  प्रतिबद्धता का स्वांग रचाने का राजनैतिक हथियार मात्र बनकर रह गए हैं. उनकी विचारधारा से तो उनके शिष्यों ने उनके जीवनकाल में ही परहेज़ करना शुरू कर दिया था. आज भी उनके असली अनुयाई  गिने चुने रह गए हैं. उनकी प्रासंगिकता पूरी दुनिया में स्वीकृत है. अपने ही देश में अपनों ने ही उन्हें बेगाना बना डाला है.