Monday, April 22, 2013


बलमुचू कर रहे कांग्रेस का बंटाधार 

नवल किशोर सिंह
रांची : रांची नगर निगम के मेयर पद के चुनाव में कांग्रेस की फजीहत के पीछे पार्टी की गुटबंदी मुख्य कारण रही है. हर कांग्रेसी इस बात से अवगत है.  अपने पिछले झारखंड दौरे के दौरान कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने यह बात स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि पार्टी में गुटबाजी चरम पर है। इससे संगठन कमजोर हो रहा है। उन्होंने ग्रासरूट तक संगठन को मजबूत करने का आह्वान किया था। लेकिन स्थिति यह है कि डेढ़ वर्ष से प्रदेश अध्यक्ष का पद किसी योग्य उम्मीदवार की बाट जोह रहा है. कार्यकाल समाप्त हो चुकने के बाद भी प्रदीप बलमुचू कार्यवाहक के तौर पर बने हुये हैं. वे हमेशा सांसद सुबोधकांत सहाय के करीबी लोगों को नीचा दिखाने के प्रयास में लगे रहते हैं.  चाहे इससे पार्टी को नुकसान ही उठाना पड़े. केंद्रीय नेतृत्व को इसकी जानकारी है. यह जानते हुये भी कि कांग्रेस बलमुचू के कार्यकाल में गुटबंदी का शिकार होकर कमजोर होती गयी है केंद्रीय नेतृत्व का इसपर ध्यान नहीं है. राहुल गांधी ने स्वीकार किया था कि संगठन को मजबूत बनाने के लिये पांच सितारा होटलों में आराम फरमाने वाले नेताओं की नहीं, आम जनता से जुड़े रहने वाले खेत-खलिहान में काम करने वाले नेताओं की जरूरत है। उन्होंने प्रदेश में पार्टी संगठन के कमजोर होने पर चिंता जतायी थी, लेकिन इस बात को जानने-समझने की जरूरत नहीं समझी कि झारखंड में पार्टी की दुर्दशा के लिए जिम्मेवार कौन है? तीन वर्ष पूर्व भी 2009 में उन्होंने यही बात कही थी और संगठन को सुदृढ़ बनाने की नसीहत   देकर गये थे। राहुल ने इस बात की समीक्षा नहीं की कि यहां उनकी नसीहत पर अमल क्यों नहीं किया जाता? उन्होंने यह स्वीकार किया कि कांग्रेस दो खेमे में बंटी है तथा नेताओं, कार्यकर्ताओं में मतभेद है। उन्होंने पार्टी में गुटबाजी को जड़ से समाप्त करने की सलाह दी, लेकिन इसकी तह तक जाने की जहमत नहीं उठायी, जिसकी वजह से संगठन कमजोर हो रहा है।  बलमुचू ऐसे अध्यक्ष हैं जो अपने विधान सभा क्षेत्र घाटशिला सीट को भी गवां बैठे। उनके प्रदेश अध्यक्ष रहते कांग्रेस के कई कद्दावर नेता चुनाव हार गये। संगठन के विस्तार, सदस्यता अभियान, कई आनुषंगिक इकाइयों-प्रकोष्ठों का गठन, उनकी गतिविधियां आदि के संदर्भ में बलमुचू कभी गंभीर नहीं दिखे। संगठन में बिखराव होता गया। पार्टी में खेमेबाजी को प्रश्रय दिया जाता रहा और प्रदेश अध्यक्ष तमाशबीन बने रहे। इसके बावजूद पार्टी आलाकमान ने बलमुचू को प्रोन्नति देकर राज्यसभा भेज दिया। उनके छह साल के कार्यकाल ने कांग्रेसियों में टूट की स्थिति पैदा कर दी है। हर प्रकोष्ठ में गुटबाजी चरम पर है। सांसद बनने के बाद भी बलमुचू प्रदेश अध्यक्ष पद से चिपके रहे। केन्द्रीय नेतृत्व ने भी उन्हें पद छोड़ने को नहीं कहा। राहुल का कहना है कि पार्टी को निष्ठावान और ईमानदार कार्यकर्ताओं की जरूरत है। पार्टी को मजबूत करना पहली प्राथमिकता हो, लेकिन राहुल यह नहीं देख पाये कि अधिसंख्य पुराने समर्पित कार्यकर्ता आज हाशिये पर हैं। उन्हें संगठन की मुख्य धारा में लाने प्रयास नहीं किया गया। अत: जरूरी यह है कि राहुल गांधी इस कमजोरी के लिए पहले जिम्मेवारी तय करें।

Wednesday, December 19, 2012

एचइसी की ज़मीन पर निजी स्कूलों की मनमानी


एचइसी प्रबंधन रांची ने अपने कर्मियों के बच्चों को शिक्षा की बेहतर सुविधा देने के लिए कई निजी स्कूलों को नाममात्र की लीज रेंट पर भूमि उपलब्ध कराई है. उनमें केरली स्कूल, संत थॉमस, सरस्वती शिशु मंदिर, विवेकानंद विद्या मंदिर, प्रभात तर स्कूल प्रमुख हैं.इन विद्यालयों ने आवंटित ज़मीन के अलावा आसपास की ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा कर भी निर्माण कार्य करा लिए हैं. लेकिन आज उनमें एचइसी के कर्मियों के बच्चों को न नामांकन में प्राथमिकता दी जा रही है न शिक्षण शुल्क में कोई रियायत. उनकी साथ वही व्यवहार किया जा रहा है जो बाहर के बच्चों के साथ. बल्कि कर्मियों के बच्चों की जगह गैर कर्मियों के बच्चों के नामांकन पर जोर दिया जा रहा है ताकि विकास शुल्क के नाम पर मनमानी रकम की उगाही की जा सके. लेकिन एचइसी प्रबंधन का इसपर कोई ध्यान नहीं है. ट्रेड युनियन, कर्मचारी संगठन, समाजसेवी संस्थाओं की प्राथमिकता सूची में भी यह मुद्दा नहीं है.बिचारे कर्मी मन मसोस कर रह जा रहे हैं. प्रबंधन का ध्यान आकृष्ट करने का कोई नतीजा नहीं निकलता. स्कूल प्रबंधन भी प्रबंधन की उदासीनता का पूरा लाभ उठाते हैं. बड़े अधिकारियों की तो वे हर तरह की सेवा करते हैं लेकिन आम कर्मियों को सैयां भये कोतवाल...के अंदाज़ में कोई भाव नहीं देते.कर्मी परेशान हैं कि उनके बच्चों को बेहतर शिक्षा कैसे मिले.

----नवल किशोर सिंह

Sunday, November 18, 2012

जन मुद्दों की पत्रकारिता गायब

आज जन मुद्दों की पत्रकारिता गायब हो चुकी है. पत्र प्रकाशन में ऐसे लोगों की जमात सक्रिय है जिनका मकसद या तो सरकारी तंत्र में घुसपैठ कर घोटालों में भागीदारी करना है या फिर थोड़ी पूँजी लगाकर सरकारी विज्ञापनों की लूट मचाना है. रांची में झारखंड-बिहार  के करीब दो दर्जन ऐसे अखबार आते हैं जिन्हें सिर्फ कुछ वरीय अधिकारियों के टेबुल पर देखा जा सकता है. जिनका न कोई कार्यालय है न कोई रिपोर्टर, किसी सरकारी कार्यालय का कर्मी या फिर विज्ञापन की दुनिया के कुछ एजेंट उमके अघोषित प्रतिनिधि होते हैं. उन्हें वेतन नहीं बल्कि कमीशन मिलता है. जन संपर्क विभाग के लोग उन्हें अच्छी तरह जानते हैं लेकिन पत्रम पुष्पम की पट्टी उनकी आँखों पर बंधी होती है. 

Thursday, September 20, 2012

तीसरे मोर्चे का पीएम प्रत्याशी बन सकती हैं ममता

डीजल की मूल्यवृद्धि, रसोई गैस की  राशनिंग और एफडीआई के मुद्दे पर तीव्र विरोध करते हुए यूपीए सरकार से समर्थन वापसी का निर्णय लेकर तृणमूल नेत्री ममता बनर्जी ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारतीय राजनीति  में वह एकमात्र नेत्री  जो सरकार के किसी जनविरोधी निर्णय का जमकर प्रतिकार करने का साहस रखती हैं मायावती और मुलायम की तरह अपने स्वार्थ के लिए हवा का रुख देखकर पलटी मारने या लालू की तरह एचएमवी रिकार्ड नहीं हैं। सरकार के हर जनविरोधी फैसले को रद्द कराने  में उनकी भूमिका सराहनीय रही है। अब जबकि यह बात सामने आ चुकी है कि तेल कंपनियों को घाटा नहीं बल्कि  मुनाफा हो रहा है और मनमोहन सरकार झूठ बोल रही है तो यह  हो जाता है कि जनता पर महंगाई का अधिकतम बोझ लादकर अगले चुनाव के लिए फंड जुटाने के उद्देश्य से  तेल कंपनियों के साथ कोई  गुप्त समझौता हुआ है। इसलिए सरकार किसी कीमत पर  पीछे हटने को  नहीं हो रही है। उसे सहयोगी दलों के चरित्र का अंदाज़ा है। उसे पता है कि ममता बनर्जी समर्थन वापस लेंगी तो केंद्रीय मंत्रिमंडल में उनके कोटे के छः मंत्रालय खाली होंगे जिसके लिए कई दल मुंह पिजाये बैठे हैं। उनमें मध्यावती चुनाव का सामना करने का साहस नहीं है। अपनी सत्ता लोलुपता को ढकने के लिए सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता से बाहर रखने का पारंपरिक तर्क मौजूद है ही। लेकिन उन्हें यह पता नहीं कि जनता चीजों को बारीकी से देख रही है और उनकी लोलुपता का माकूल जवाब देगी . अभी ममता बनर्जी के प्रति देशवासियों के मन जो प्रेम और आदर की भावना जागृत हुई है कोई आश्चर्य नहीं कि अगले चुनाव में उन्हें तीसरे मोर्चे के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में स्वीकार कर लिया जाये। वैसे भी ममता संघर्ष के गर्भ से निकली साफ़ -सुथरी छवि की नेत्री हैं। वर्तमान भारतीय राजनीति में ऐसे लोग दुर्लभ हैं।

----नवल किशोर सिंह 

Sunday, September 16, 2012

सुधार का स्वाद कौन उठाएगा

डीजल और रसोई गैस की कीमतें बढाकर हमारे प्रधानमंत्री जी कौन सा आर्थिक सुधार करना चाहते हैं सामान्य जन की समझ के बाहर है। यह कोई पहली बार नहीं है। हर दो चार महीने पर महंगाई में इजाफा कर कॉंग्रेस के नुमाइंदे इस कदर खुश हो जाते हैं जैसे बहुत बड़ा तीर मार लिया हो।  बाज़ार को आमजन की पहुंच के बाहर कर वे देशवासियों को जीते जी मार ही डालेंगे तो सुधार का स्वाद कौन उठाएगा। उनके विदेशी आका?