महात्मा गाँधी की पुण्य तिथि मनाने की रश्म सरकारी तौर पर पूरी कर ली गयी. गाँधी अब दरअसल दीवालों में सजाने या वैचारिक प्रतिबद्धता का स्वांग रचाने का राजनैतिक हथियार मात्र बनकर रह गए हैं. उनकी विचारधारा से तो उनके शिष्यों ने उनके जीवनकाल में ही परहेज़ करना शुरू कर दिया था. आज भी उनके असली अनुयाई गिने चुने रह गए हैं. उनकी प्रासंगिकता पूरी दुनिया में स्वीकृत है. अपने ही देश में अपनों ने ही उन्हें बेगाना बना डाला है.