बलमुचू कर रहे कांग्रेस का बंटाधार
नवल किशोर सिंह
रांची : रांची नगर निगम के मेयर पद के चुनाव में कांग्रेस की फजीहत के पीछे पार्टी की गुटबंदी मुख्य कारण रही है. हर कांग्रेसी इस बात से अवगत है. अपने पिछले झारखंड दौरे के दौरान कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने यह बात स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि पार्टी में गुटबाजी चरम पर है। इससे संगठन कमजोर हो रहा है। उन्होंने ग्रासरूट तक संगठन को मजबूत करने का आह्वान किया था। लेकिन स्थिति यह है कि डेढ़ वर्ष से प्रदेश अध्यक्ष का पद किसी योग्य उम्मीदवार की बाट जोह रहा है. कार्यकाल समाप्त हो चुकने के बाद भी प्रदीप बलमुचू कार्यवाहक के तौर पर बने हुये हैं. वे हमेशा सांसद सुबोधकांत सहाय के करीबी लोगों को नीचा दिखाने के प्रयास में लगे रहते हैं. चाहे इससे पार्टी को नुकसान ही उठाना पड़े. केंद्रीय नेतृत्व को इसकी जानकारी है. यह जानते हुये भी कि कांग्रेस बलमुचू के कार्यकाल में गुटबंदी का शिकार होकर कमजोर होती गयी है केंद्रीय नेतृत्व का इसपर ध्यान नहीं है. राहुल गांधी ने स्वीकार किया था कि संगठन को मजबूत बनाने के लिये पांच सितारा होटलों में आराम फरमाने वाले नेताओं की नहीं, आम जनता से जुड़े रहने वाले खेत-खलिहान में काम करने वाले नेताओं की जरूरत है। उन्होंने प्रदेश में पार्टी संगठन के कमजोर होने पर चिंता जतायी थी, लेकिन इस बात को जानने-समझने की जरूरत नहीं समझी कि झारखंड में पार्टी की दुर्दशा के लिए जिम्मेवार कौन है? तीन वर्ष पूर्व भी 2009 में उन्होंने यही बात कही थी और संगठन को सुदृढ़ बनाने की नसीहत देकर गये थे। राहुल ने इस बात की समीक्षा नहीं की कि यहां उनकी नसीहत पर अमल क्यों नहीं किया जाता? उन्होंने यह स्वीकार किया कि कांग्रेस दो खेमे में बंटी है तथा नेताओं, कार्यकर्ताओं में मतभेद है। उन्होंने पार्टी में गुटबाजी को जड़ से समाप्त करने की सलाह दी, लेकिन इसकी तह तक जाने की जहमत नहीं उठायी, जिसकी वजह से संगठन कमजोर हो रहा है। बलमुचू ऐसे अध्यक्ष हैं जो अपने विधान सभा क्षेत्र घाटशिला सीट को भी गवां बैठे। उनके प्रदेश अध्यक्ष रहते कांग्रेस के कई कद्दावर नेता चुनाव हार गये। संगठन के विस्तार, सदस्यता अभियान, कई आनुषंगिक इकाइयों-प्रकोष्ठों का गठन, उनकी गतिविधियां आदि के संदर्भ में बलमुचू कभी गंभीर नहीं दिखे। संगठन में बिखराव होता गया। पार्टी में खेमेबाजी को प्रश्रय दिया जाता रहा और प्रदेश अध्यक्ष तमाशबीन बने रहे। इसके बावजूद पार्टी आलाकमान ने बलमुचू को प्रोन्नति देकर राज्यसभा भेज दिया। उनके छह साल के कार्यकाल ने कांग्रेसियों में टूट की स्थिति पैदा कर दी है। हर प्रकोष्ठ में गुटबाजी चरम पर है। सांसद बनने के बाद भी बलमुचू प्रदेश अध्यक्ष पद से चिपके रहे। केन्द्रीय नेतृत्व ने भी उन्हें पद छोड़ने को नहीं कहा। राहुल का कहना है कि पार्टी को निष्ठावान और ईमानदार कार्यकर्ताओं की जरूरत है। पार्टी को मजबूत करना पहली प्राथमिकता हो, लेकिन राहुल यह नहीं देख पाये कि अधिसंख्य पुराने समर्पित कार्यकर्ता आज हाशिये पर हैं। उन्हें संगठन की मुख्य धारा में लाने प्रयास नहीं किया गया। अत: जरूरी यह है कि राहुल गांधी इस कमजोरी के लिए पहले जिम्मेवारी तय करें।