आज जन मुद्दों की पत्रकारिता गायब हो चुकी है. पत्र प्रकाशन में ऐसे लोगों की जमात सक्रिय है जिनका मकसद या तो सरकारी तंत्र में घुसपैठ कर घोटालों में भागीदारी करना है या फिर थोड़ी पूँजी लगाकर सरकारी विज्ञापनों की लूट मचाना है. रांची में झारखंड-बिहार के करीब दो दर्जन ऐसे अखबार आते हैं जिन्हें सिर्फ कुछ वरीय अधिकारियों के टेबुल पर देखा जा सकता है. जिनका न कोई कार्यालय है न कोई रिपोर्टर, किसी सरकारी कार्यालय का कर्मी या फिर विज्ञापन की दुनिया के कुछ एजेंट उमके अघोषित प्रतिनिधि होते हैं. उन्हें वेतन नहीं बल्कि कमीशन मिलता है. जन संपर्क विभाग के लोग उन्हें अच्छी तरह जानते हैं लेकिन पत्रम पुष्पम की पट्टी उनकी आँखों पर बंधी होती है.