आज जन मुद्दों की पत्रकारिता गायब हो चुकी है. पत्र प्रकाशन में ऐसे लोगों की जमात सक्रिय है जिनका मकसद या तो सरकारी तंत्र में घुसपैठ कर घोटालों में भागीदारी करना है या फिर थोड़ी पूँजी लगाकर सरकारी विज्ञापनों की लूट मचाना है. रांची में झारखंड-बिहार के करीब दो दर्जन ऐसे अखबार आते हैं जिन्हें सिर्फ कुछ वरीय अधिकारियों के टेबुल पर देखा जा सकता है. जिनका न कोई कार्यालय है न कोई रिपोर्टर, किसी सरकारी कार्यालय का कर्मी या फिर विज्ञापन की दुनिया के कुछ एजेंट उमके अघोषित प्रतिनिधि होते हैं. उन्हें वेतन नहीं बल्कि कमीशन मिलता है. जन संपर्क विभाग के लोग उन्हें अच्छी तरह जानते हैं लेकिन पत्रम पुष्पम की पट्टी उनकी आँखों पर बंधी होती है.
Sunday, November 18, 2012
Thursday, September 27, 2012
Saturday, September 22, 2012
Thursday, September 20, 2012
तीसरे मोर्चे का पीएम प्रत्याशी बन सकती हैं ममता
डीजल की मूल्यवृद्धि, रसोई गैस की राशनिंग और एफडीआई के मुद्दे पर तीव्र विरोध करते हुए यूपीए सरकार से समर्थन वापसी का निर्णय लेकर तृणमूल नेत्री ममता बनर्जी ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारतीय राजनीति में वह एकमात्र नेत्री जो सरकार के किसी जनविरोधी निर्णय का जमकर प्रतिकार करने का साहस रखती हैं मायावती और मुलायम की तरह अपने स्वार्थ के लिए हवा का रुख देखकर पलटी मारने या लालू की तरह एचएमवी रिकार्ड नहीं हैं। सरकार के हर जनविरोधी फैसले को रद्द कराने में उनकी भूमिका सराहनीय रही है। अब जबकि यह बात सामने आ चुकी है कि तेल कंपनियों को घाटा नहीं बल्कि मुनाफा हो रहा है और मनमोहन सरकार झूठ बोल रही है तो यह हो जाता है कि जनता पर महंगाई का अधिकतम बोझ लादकर अगले चुनाव के लिए फंड जुटाने के उद्देश्य से तेल कंपनियों के साथ कोई गुप्त समझौता हुआ है। इसलिए सरकार किसी कीमत पर पीछे हटने को नहीं हो रही है। उसे सहयोगी दलों के चरित्र का अंदाज़ा है। उसे पता है कि ममता बनर्जी समर्थन वापस लेंगी तो केंद्रीय मंत्रिमंडल में उनके कोटे के छः मंत्रालय खाली होंगे जिसके लिए कई दल मुंह पिजाये बैठे हैं। उनमें मध्यावती चुनाव का सामना करने का साहस नहीं है। अपनी सत्ता लोलुपता को ढकने के लिए सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता से बाहर रखने का पारंपरिक तर्क मौजूद है ही। लेकिन उन्हें यह पता नहीं कि जनता चीजों को बारीकी से देख रही है और उनकी लोलुपता का माकूल जवाब देगी . अभी ममता बनर्जी के प्रति देशवासियों के मन जो प्रेम और आदर की भावना जागृत हुई है कोई आश्चर्य नहीं कि अगले चुनाव में उन्हें तीसरे मोर्चे के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में स्वीकार कर लिया जाये। वैसे भी ममता संघर्ष के गर्भ से निकली साफ़ -सुथरी छवि की नेत्री हैं। वर्तमान भारतीय राजनीति में ऐसे लोग दुर्लभ हैं।
----नवल किशोर सिंह
----नवल किशोर सिंह
Sunday, September 16, 2012
सुधार का स्वाद कौन उठाएगा
डीजल और रसोई गैस की कीमतें बढाकर हमारे प्रधानमंत्री जी कौन सा आर्थिक सुधार करना चाहते हैं सामान्य जन की समझ के बाहर है। यह कोई पहली बार नहीं है। हर दो चार महीने पर महंगाई में इजाफा कर कॉंग्रेस के नुमाइंदे इस कदर खुश हो जाते हैं जैसे बहुत बड़ा तीर मार लिया हो। बाज़ार को आमजन की पहुंच के बाहर कर वे देशवासियों को जीते जी मार ही डालेंगे तो सुधार का स्वाद कौन उठाएगा। उनके विदेशी आका?
Monday, June 6, 2011
बर्बादी के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर
रामलीला मैदान में जो कुछ हुआ वह अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. एक संत पर हमला कर यूपीए सरकार ने अपनी बर्बादी के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर कर दिया है. 1974 में इंदिरा गांधी ने एक राजनैतिक संत लोकनायक जयप्रकाश नारायण की सभा में लाठी चार्ज कराकर कांग्रेस की बर्बादी की कहानी शुरू की थी जिसका भुगतान आजतक उत्तर भारत में जनाधार संकुचन के रूप में चुकाना पड रहा है. बाबा रामदेव के अनशन स्थल पर बर्बरता का तांडव कराकर फिर उसी गलती की पुनरावृति की गयी है. इंदिरा गांधी एक ताक़तवर और दबंग महिला थीं स्वभाव की जिद्दी थीं लेकिन राजनैतिक रूप से परिपक्व थीं. जब भारत की जनता ने उनकी तानाशाही को बर्दाश्त नहीं किया तो अभी के कांग्रेसी नेतृत्व की तानाशाही को कैसे बर्दाश्त करेगी. अभी तो इंदिरा की कद-काठी क्या उनकी नाखून के बराबर कद का भी कोई नेता कांग्रेस में नहीं है.फिर एक संत से टकराने को एक आत्मघाती कदम के अलावा और क्या कहेंगे.
---नवल किशोर सिंह
Sunday, January 30, 2011
यदि गाँधी जीवित होते...
महात्मा गाँधी की पुण्य तिथि मनाने की रश्म सरकारी तौर पर पूरी कर ली गयी. गाँधी अब दरअसल दीवालों में सजाने या वैचारिक प्रतिबद्धता का स्वांग रचाने का राजनैतिक हथियार मात्र बनकर रह गए हैं. उनकी विचारधारा से तो उनके शिष्यों ने उनके जीवनकाल में ही परहेज़ करना शुरू कर दिया था. आज भी उनके असली अनुयाई गिने चुने रह गए हैं. उनकी प्रासंगिकता पूरी दुनिया में स्वीकृत है. अपने ही देश में अपनों ने ही उन्हें बेगाना बना डाला है.
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